सिंचाई का नाला अब खतरे की निशानी, घोड़ानाले में मगरमच्छों से दहशत

Published: 07 Feb 2026, 07:40 AM   |   Updated: 07 Feb 2026, 07:43 AM
Category: उत्तराखंड   |   By: Admin

लालकुआं।
जो नाला कभी खेतों की प्यास बुझाता था, आज वही लोगों की नींद और सुकून छीन रहा है। क्षेत्र का घोड़ानाला अब रहमत नहीं, बल्कि डर और ज़हर की पहचान बन चुका है। सेंचुरी पेपर मिल से छोड़े जा रहे वेस्ट वाटर और नाले में बढ़ती मगरमच्छों की संख्या ने बिंदुखत्ता समेत आसपास के दर्जनों गांवों में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है।

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार घोड़ानाले में वर्तमान में सेंचुरी पेपर मिल का वेस्ट वाटर छोड़ा जा रहा है। लोगों को आशंका है कि इस पानी में रसायनों की मात्रा अधिक है। नाले के पानी का रंग बदल चुका है और उससे तेज बदबू आती है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले इसी पानी से खेतों की सिंचाई होती थी, लेकिन अब यह पानी फसलों, मिट्टी और पशुओं के स्वास्थ्य के लिए खतरा बन गया है।

घोड़ानाला बिंदुखत्ता के राजीवनगर, पटेल नगर, मुल्तानगर, बाजपुर चौराहा, सुभाष नगर, पश्चिम राजीवनगर, शास्त्री नगर, सत्रह एकड़, गांधीनगर, हल्दूधार, जवाहर नगर और शान्तिपूरी से होते हुए किच्छा तक बहता है। इन इलाकों में रहने वाले हजारों लोगों की दिनचर्या प्रभावित हो रही है। बरसात के दिनों में नाला उफनाता है तो हालात और भी भयावह हो जाते हैं।

मगरमच्छों ने बढ़ाया खतरा

नाले में मगरमच्छों की बढ़ती संख्या ने ग्रामीणों की चिंता और बढ़ा दी है। ग्रामीणों के अनुसार दर्जनों छोटे-बड़े मगरमच्छ अक्सर नाले से बाहर निकलकर खेतों और सड़कों पर धूप सेंकते नजर आते हैं। बरसात के समय जब नाले का पानी आबादी में फैलता है, तो मगरमच्छ घरों के आसपास तक पहुंच जाते हैं। हाल ही में एक महिला पर मगरमच्छ के हमले की कोशिश की घटना सामने आई, जिससे गांवों में डर और गहरा गया है। 

वन विभाग की चिंता, लेकिन समस्या जस की तस

वन विभाग ने पहले भी कुछ मगरमच्छों का रेस्क्यू किया है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि नाले में मगरमच्छों का प्राकृतिक प्रजनन हो रहा है, जिससे उनकी संख्या बार-बार बढ़ जाती है। विभाग की ओर से निगरानी बढ़ाने और जरूरत पड़ने पर आगे भी रेस्क्यू अभियान चलाने की बात कही जा रही है।

मिल प्रबंधन का पक्ष

सेंचुरी पेपर मिल प्रबंधन का कहना है कि उनका वेस्ट वाटर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के अनुसार शोधन के बाद ही नाले में छोड़ा जाता है। प्रबंधन के अनुसार नाले में वन्यजीवों की मौजूदगी प्राकृतिक कारणों से है और इस समस्या के समाधान के लिए वे प्रशासन और वन विभाग के साथ समन्वय को तैयार हैं।

ग्रामीणों की साफ मांग

ग्रामीणों की मांग है कि नाले के पानी की स्वतंत्र प्रयोगशाला से जांच कराई जाए और रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। आबादी वाले क्षेत्रों में नाले को ढकने या भूमिगत करने की व्यवस्था की जाए। साथ ही नाले के किनारे सुरक्षा फेंसिंग और चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं, ताकि मानव और वन्यजीव संघर्ष रोका जा सके।

ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल मगरमच्छों का मामला नहीं, बल्कि पानी की गुणवत्ता, खेती और लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा है। प्रशासन से मांग की जा रही है कि किसी बड़ी अनहोनी से पहले ठोस और स्थायी समाधान निकाला जाए।

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